Tuesday, December 22, 2015

स्टेटस अपडेट

सोच कर लगता है डर,
जब इस नए साल पर,
सबके चेहरे चमचमाएंगे,
और मेरे फेसबुक पर,
जब कोई नए अपडेट नहीं आ पाएंगे। 

यह नहीं है कोई मज़ाक की बात,
बहुत गंभीर विषय है आज,
क्रिसमस की छुट्टियों पर,
क्या मैं, कहीं न जा पाऊँगी,
लगता है इस बार "स्टेटस" अपडेट नहीं कर पाऊंगी। 

पिछले दो-तीन महीनों से मैंने,
परफेक्ट पाउट पाने के लिए,
हर फोटो में दिखाई इस कला की रंगत,
पर रंगत को संगत न मिल पाएंगी ,
लगता है "एक्साइटेड विद" मैं नहीं लिख पाऊंगी। 

नई फोटो एल्बम की बारिशों में,
क्या मेरा वॉल सूखा ही रह जाएगा,
किसी नई जगह के बारें में ,
बात करने का मौका मुझे नहीं मिल पाएगा ,
लगता है, "ट्रेवलिंग टू " का अपडेट नहीं लिख पाऊंगी। 

लाइक्स और कमेंट्स की भीड़ में,
मैं इतना अधिक पिछड़ सी जाऊंगी ,
कि मेरे दोस्त मुझे तुच्छ समझकर,
मेरे कमेंट पर स्माइली दे मुझसे किनारा कर जायेंगे,
लगता है "लाइक और कमेंट" पाने के लिए मैं तरस जाऊंगी। 

कितना अच्छा था हमारा बचपन,
नानी घर जाने की ख़ुशी में भी झूलता था मन,
और आज नए लोकेशन जाने की जंग,
रातों की नींद को कर देती है तंग,
लगता है नया "लोकेशन"अपडेट नहीं कर पाऊंगी। 

कभी कभी मुझे लगता है ऐसा,
मोह-माया को त्याग दूँ जैसा,
पर सोशल साइट्स की चमचमाती दुनिया,
कुछ नया करने को कर देती है मजबूर,
लगता है कुछ अलग ही ट्रिक मैं इस बार अपनाऊंगी। 

पर कुछ न कुछ तो मैं नया  अपडेट कर ही जाऊंगी। 


- प्रीति बिष्ट सिंह 

Wednesday, December 17, 2014

कैसा लगता होगा

कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे को सुबह जगाया होगा,
उसके बहानो का सिरहाने खिंच,
उसकी आलस की रजाई को हटाया होगा।

उसकी हर बात को काट कर,
उसके हर तर्क को तोड़ कर,
स्कूल जाने के लिए उसे बिस्तर से,
जबर्दस्ती बाहर खींच कर निकाला होगा।

कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

बेटे के लटके हुए मुंह को देखकर,
मन उसका भी उदास हुआ होगा,
तभी तो स्कूल जाते हुए अपने बच्चे के
बालों को उसने सहलाया था।

अजीब लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

घर से निकलते हुए बेटे को देख,
उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था,
आखिर बेटे ने माँ की बात मानी,
इससे बड़ा भला क्या कोई इनाम था?

गर्व होता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

बेटे ने जब अलविदा कह कर,
उसकी ओर अपना हाथ हिलाया होगा,
तब माँ ने भी उसे घर आकर,
"क्या खाओगे" का लाड़ दिखाया होगा।

अच्छा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

आखों से ओझिल होने तक,
रूककर भी उसने उसे देखा न होगा,
आखिर देखती भी क्यों?
उसका बेटा तो सिर्फ स्कूल जा रहा था सरहद नही।

अच्छा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

बिखरे घर को समेटती माँ को,
पता नही था की उसका घर बिखर गया,
तभी तो वो अब भी यही सोच रही,
उसका बेटा घर आकर क्या खायेगा ?

कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

जब उसे पता चला होगा,
अपने को कोसते हुए, अपनी छाती को पीटा होगा ,
माथा पकड़ यही सोचा होगा,
क्यों उसने अपने बेटे की बात नही मानी ?

अब कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

स्कूल की वर्दी में मुस्कुराते हुए,
हाथ हिलाते हुए उसका बेटा ,
जब कफ़न में आया होगा,
बिलखते कांपते हाथों में उसने उसे सीने से लगाया होगा।

कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।
कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।


Friday, September 26, 2014

बेलगाम "हां"

जब भी इसकी किसी पर पड़ती है मार,
सच्चाई, तुलना और ज्ञान हो जाते है तार-तार,
इसके आगे सब जाते है हार,
खाली इसका जाता नहीं है कोई भी वार।

अपनी होकर भी यह नहीं बनती है ढाल,
इसकी जान सका न कोई चाल ,
बन कर फिर मेरा यह काल,
देखो, फिर कर गयी है मुझे बेहाल।

बेहयाई से दिखाते हुए यह दांत ,
खिंच कर ले जाती है मेरी साँस,
दुहाई में निकले मेरे शब्द "हाय-हाय",
इक पल में इसे यह "हां" में बदल जाएँ। 

कहते है दिलो-दिमाग की सुनो बात,
मिलकर करो कुछ ऐसा हिसाब,
ताकि समस्याएं हो जाएँ आसान,
परिस्थिति भी हो जाएँ हम पर मेहरबान।

पर दिमाग की यह सुनती नहीं है कोई बात,
चाहे बिगड़ जाएँ फिर कितने ही हालत,
सूख जाएँ कंठ या पेट की आंत,
करेगी वहीँ जिसमे साथी दे इसका साथ।

मुंह से निकले शब्द और साथी गर्दन का झुकाव,
अपनी प्राथमिकताओं को लगा कर दांव,
दूसरों की मदद करने का निस्वार्थ भाव,
जल्द ही बदल देता है चेहरे के हाव-भाव। 

ऐसा ही होता है जब बिन सोंचे कहते है हां,
"न" शब्द मन के कोने में पड़े रह जाते है बेजान,
हो जाती है सब प्लानिंग तब बेकार,
एक बार जो मुख से फिसले जुबान।

इसलिए गांठ बाढ़ लो मेरी एक बात,
चाहे रुआंसे चेहरे लिए सामने खड़े हो जाएँ हालत ,
तुम अड़िग और दृढ़ता का ले साथ ,
चलाओगे जुबान जब तुम्हारे काम से हो खाली हाथ।

 

Wednesday, July 16, 2014

अभिराज और हम

तीन साल कब गए हैं बीत ,
कुछ पता ही न चला,
समय बढ़ने की ये रीत ,
रोके से रुका है क्या भला ?
 
तुमसे गई हूँ मैं इतनी जुड़,
कि देखती हूँ जब पीछे मुड़ ,
हो जाती हूँ मैं हैरान ,
कैसे बदल गया भावनाओं का सामान। 
 
कुछ समझाने से डरते कदम,
आज, मेरे तुम्हें है समझाते ,
डांट कर डराती मेरी आँखें ,
तेरी मुस्कान पर है मर जाते।
 
तेरे आधे अधूरे शब्द भी ,
मेरे आगे एक कहानी है कह जाते ,
तेरी बदमाशियों के आगे,
मेरे क्रोध के कदम क्यों है डगमगाते। 
 
"तेरे-मेरे" शब्द पर चिढ़ते भाव ,
"मेरी मम्मा " सुन आज गदगदाते,
बिखरी चीजों को देख,
आज मेरे शब्द क्यों नहीं चिल्लाते!
 
तेरी हर इच्छा हो पूरी,
चाहे रह जाएँ नींद मेरी अधूरी ,
थके हुए क़दमों को थामे ,
ऐसी क्यों है इच्छा जागे !
 
दुआं है मेरी उससे ,
हर साल जन्मदिन पर जुड़ें किस्से ,
खुशियों का यह दौर चलता जाएँ ,
समय चाहें कितना ही आगे निकल जाएँ।  
 
किसी से तुम घबराना नहीं,
गिरने के डर से कपकपाना नहीं ,
मुड़कर देखों तो एक बार पीछे ,
एक की जगह दो सायें खडें है तेरे क़दमों के नीचे। 
 
- प्रीति बिष्ट सिंह 

Saturday, October 5, 2013

बहस

हस हस कर जब की जाती है लड़ाई,
उसी को "बहस" कहते है मेरे भाई,
मुश्किल नहीं, जटिल है करना यह काम,
तीन अक्षर लगा सकते है देश में जाम. 

इसे न समझो तुम इतना हल्का,
ये अकेले नहीं, कई चर्चाओं की है लंका,
साम-दाम-दंड का है ये बेजोड़ मिश्रण,
किसी के स्वाभिमान को तोड़ने में लगाएं न यह इक क्षण।

इसका शुभारम्भ करो तुम कुछ ऐसे,
उठाओ इक विषय और पकड़ो भला मानुष जो भी दिखे,
शुरू करो  किसी विषय पर तुम करनी बात,
और फिर चलाओ अपनी कटु जुबान रूपी लात। 

अड़े रहो तुम बस अपनी बात पर कुछ ऐसे,
नाराज हुआ गधा सामान लिए खड़ा हो जैसे,
कुछ भी हो डगमगाओ नहीं अपने कदम,
प्यार से समझाने वालों से दूर ही रहो हरदम।

बात न बनती दिखे तो चलाओ अपनी अकल,
अपने शब्दों में कर दो थोडा सा फेर बदल,
तब भी न बने बात तो जोर से चिल्लाओ,
ऊँची आवाज से दूसरे के मन को घबराओ।

बात तब भी न बने तो दूसरा प्लान अपनाओ,
किसी पुरानी गलती को सबके सामने ले आओ,
ध्यान रहें, बंद न हो तुम्हारे आरोपों के बान,
यहीं है, असली बहस का मूलभूत औ गूढ़ ज्ञान। 



Saturday, September 21, 2013

छोटी सी लड़की

छोटी सी लड़की हूँ मैं,
छोटी-छोटी है खुशियाँ मेरी,
छोटी-छोटी है ख्व्वाइशें मेरी,
छोटी अखियाँ जिन्हें सीती मेरी।

दुनिया बहुत है छोटी मेरी,
औ जिन्दगी है थोड़ी टेढ़ी,
बहुत कुछ डूब जाता ऐरी,
गर छोटी-छोटी खुशियाँ न होती मेरी।

छोटी सी लड़की हूँ मैं,
छोटी-छोटी है खुशियाँ मेरी,
छोटी-छोटी है ख्व्वाइशें मेरी,
छोटी अखियाँ जिन्हें सीती मेरी।

सब जीते है बहुत कुछ पाने को,
गम पीते  है मंजिल को करीब लाने को,
मैं जीती हूँ तेरे और करीब आने को,
तेरी एक छोटी सी मुस्कान पर बिखर जाने को।

छोटी सी लड़की हूँ मैं,
छोटी-छोटी है खुशियाँ मेरी,
छोटी-छोटी है ख्व्वाइशें मेरी,
छोटी अखियाँ जिन्हें सीती मेरी।

जिन्दगी भर तेरा यूँ ही साथ रहें,
फिर फ़िक्र की कहां बात रहें,
मेरे हाथों को थामे तेरा हाथ रहें,
और कोई किसी से कुछ न कहें।

छोटी सी लड़की हूँ मैं,
छोटी-छोटी है खुशियाँ मेरी,
छोटी-छोटी है ख्व्वाइशें मेरी,
छोटी अखियाँ जिन्हें सीती मेरी।

तुझ तक ही है मेरा सीमित दायरा,
मुझे समझाने को कोई नहीं है अब फायदा,
तेरे बिन, जीने का मैंने पढ़ा ही नहीं है कायदा,
अब तो तेरा प्यार मेरे मरने के साथ ही जायेगा।

छोटी सी लड़की हूँ मैं,
छोटी-छोटी है खुशियाँ मेरी,
छोटी-छोटी है ख्व्वाइशें मेरी,
छोटी अखियाँ जिन्हें सीती मेरी।

Tuesday, September 3, 2013

समाज में बढ़ती छेड़छाड़ी,
मनचलों के तानो की आरी,
घर-परिवार की जिम्मदारी,
कितनी अबला है तू नारी।