Tuesday, August 27, 2013

चुप्पी

बहुत कम बोलती हूँ मैं,
ऐसा बहुतों को लगता है,
मन ही मन कुछ घोलती हूँ मैं,
कुछ की आँखों में यह खटकता है.

कुछ कहते है डरती हूँ मैं,
इसलिए चुपचाप रहती हूं,
कुछ कहते है अहंकारी हूँ मैं,
अहम में डूबी चलती हूँ.

कुछ की मानें तो घुन्नी हूँ मैं,
तभी तो चुपचुप रहती हूँ,
कुछ समझे चालाक मुझे,
चुप रहकर सबकी चाले मैं पढ़ती हूँ.

पर मैं न तो डरपोक कोई,
और न ही अहंकारी हूँ,
न ही घुन की तरह घुन्नी,
और न ही चपल चालाक हूँ.

मैं तो चुप हूँ बस इसलिए,
क्योंकि तुम कुछ हो बोल रहे,
और कभी चुप हूँ इसलिए,
ताकि विवादों को विराम लगे.

कमजोरी है यह मेरी बहुत पुरानी,
भावनाएं व्यक्त नहीं है होती,
शब्द, भंगिमाएं साथ नहीं देती,
मेरे अरुचिकर होने की बात ये है कहती।

छूट गया है मेरे कई दोस्तों से साथ,
हाथ मिलकर जो कभी खड़े थे मेरे साथ,
डरती हूँ कि कहीं मेरे अपने न छूट जाएँ,
मेरी इस चुप्पी में मेरी खुशियों के रंग न उड़ जाएँ। 

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