Tuesday, February 21, 2017

व्यथा

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर "व्यथा" कविता से शायद बहुत से लोग अपनी व्यथा को जोड़ पाएं।

जिन लोगों को देख कर,
चुप हो जाती थी बोलियां,
जिन लोगों से झेप कर,
कट जाती थी डोरियां,
आज उन लोगों को देख कर,
गुस्सा आता है मुझे बार-बार,
जिनके कारण अपनी बोली, अपनी जमीं छोड़ी,
उनकी गुशुदगी करती है परेशान बार-बार।

हम भी हो "उन लोगों " में शामिल,
बस, यहीं सपना दिखता था हरबार,
गंवार, लोकल के टैग से बचने की खातिर,
भ्रम पैदा किए हमने एक नहीं बल्कि हज़ार,
कभी हमने अपनी जमीन बदली,
तो कभी हमने अपने बोल,
कभी नकली आवरण से,
हमने ढका अपने को चारो ओर।

पर आज अफ़सोस होता है ये सोचकर,
मैं कहीं का भी नहीं रहा,
न मुझमे "उन लोगों " का नयापन आया,
न मैंने अपनों से अपनापन पाया,
खो दिया मैंने उन संस्कारों को भी,
जो बीज से फूटी कोपल संग मुझे मिला था,
नकलीपन के इस आँगन में धूप तो है,
पर न मेरी जमीन है न मेरी बोली की गर्मी।

- प्रीति बिष्ट सिंह 

Thursday, May 19, 2016

"मुझे पता नहीं "

"मुझे पता नहीं" कहने वालों का,
अक्सर होता है यहीं हाल,
जब पड़ती है उनपर मुसीबत,
जीना हो जाता है दुशवार। 

"मुझे पता नहीं" अजीब है ये शब्द,
यह शब्द नहीं, लाचारी है बेबस,
जीवनभर "मुझे पता नहीं " कहने वाले,
समस्या का हल कभी नहीं है खोज पाते। 

"मुझे पता नहीं" आप जानते है या नहीं,
एक मानसिक बीमारी है यह वहीं ,
पहले शब्द फिर दिलो-दिमाग में यह घुसती,
"मुझे पता नहीं" क्यों मगर जीवन और सोच को सुस्त ये करती।

आप किसी चर्चा का हिस्सा नहीं बन पाते,
 "मुझे पता नहीं" आपकी भावना को अवरुद्ध कर जाते,
न भाव, न शब्द रह जाते है आपके साथ,
"मुझे पता नहीं " आप मेरी समझ रहें है न बात। 

"मुझे पता नहीं " ये कविता का कैसे होगा अंत,
"मुझे पता नहीं " मेरी बात में था कुछ दमखम ,
"मुझे पता नहीं " ये पढ़ आप क्या सोचेंगे मेरे बारे में ,
"मुझे पता नहीं ", "पता नहीं" श्रेणी वाले  तो मेरी व्यथा समझेंगे। 

इसलिए अगली बार जब किसी "पता नहीं" से मिले,
इस बात को हमेशा याद रखें ,
"मुझे पता नहीं "कहने वालों से न दूर भागे,
"मुझे पता नहीं " कब आप भी "पता नहीं " की श्रेणी में आ जाएं। 

आ गए तो सोच लीजिएगा अपना हाल ,
"मुझे पता नहीं " मैं क्यों समझा रही हूँ बार-बार ,
समझने वाले तो एक बार में ही समझ जाते,
बाकि "मुझे पता नहीं "कुछ कभी क्यों नहीं समझ पाते। 

- प्रीति बिष्ट सिंह 

Friday, April 15, 2016

डर

डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
जिनके असीमित ज्ञान भंडार को,
सब पता होता है  पहले से। 

डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
जो आपके आधे-अधूरे वाक्यों से,
निष्कर्ष तक की सीढ़ी बना है लेते। 

डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
जिनकी आवाज की तीक्ष्णता,
आपकी आवाज को हरदम है दबाते। 

डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
जो आपके भावों की धार को,
अपने अनुमान से है बहाते। 

डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
जो मेरे सांस के अहसास में भी,
बात खोज, उसका भावार्थ है निकलते। 

डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
जो आपको अपनी बात कहने से पहले ,
आपके गलत होने का अहसास है कराते। 

अब तो डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
कहीं मेरा आत्मविश्वास वाष्प बनकर,
कहीं दूर न उड़ जाएं। 

डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
जो अज्ञानी की जबरन चोला पहनाकर ,
कहीं उसमे मेरा दम न घुट जाएँ. 

डर लगता है मुझे,
उन लोगो से मिलके,
मन घबराता है मेरा,
ऐसे लोगो के बारे में सोच के। 

- प्रीति बिष्ट सिंह 

Tuesday, December 22, 2015

स्टेटस अपडेट

सोच कर लगता है डर,
जब इस नए साल पर,
सबके चेहरे चमचमाएंगे,
और मेरे फेसबुक पर,
जब कोई नए अपडेट नहीं आ पाएंगे। 

यह नहीं है कोई मज़ाक की बात,
बहुत गंभीर विषय है आज,
क्रिसमस की छुट्टियों पर,
क्या मैं, कहीं न जा पाऊँगी,
लगता है इस बार "स्टेटस" अपडेट नहीं कर पाऊंगी। 

पिछले दो-तीन महीनों से मैंने,
परफेक्ट पाउट पाने के लिए,
हर फोटो में दिखाई इस कला की रंगत,
पर रंगत को संगत न मिल पाएंगी ,
लगता है "एक्साइटेड विद" मैं नहीं लिख पाऊंगी। 

नई फोटो एल्बम की बारिशों में,
क्या मेरा वॉल सूखा ही रह जाएगा,
किसी नई जगह के बारें में ,
बात करने का मौका मुझे नहीं मिल पाएगा ,
लगता है, "ट्रेवलिंग टू " का अपडेट नहीं लिख पाऊंगी। 

लाइक्स और कमेंट्स की भीड़ में,
मैं इतना अधिक पिछड़ सी जाऊंगी ,
कि मेरे दोस्त मुझे तुच्छ समझकर,
मेरे कमेंट पर स्माइली दे मुझसे किनारा कर जायेंगे,
लगता है "लाइक और कमेंट" पाने के लिए मैं तरस जाऊंगी। 

कितना अच्छा था हमारा बचपन,
नानी घर जाने की ख़ुशी में भी झूलता था मन,
और आज नए लोकेशन जाने की जंग,
रातों की नींद को कर देती है तंग,
लगता है नया "लोकेशन"अपडेट नहीं कर पाऊंगी। 

कभी कभी मुझे लगता है ऐसा,
मोह-माया को त्याग दूँ जैसा,
पर सोशल साइट्स की चमचमाती दुनिया,
कुछ नया करने को कर देती है मजबूर,
लगता है कुछ अलग ही ट्रिक मैं इस बार अपनाऊंगी। 

पर कुछ न कुछ तो मैं नया  अपडेट कर ही जाऊंगी। 


- प्रीति बिष्ट सिंह 

Wednesday, December 17, 2014

कैसा लगता होगा

कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे को सुबह जगाया होगा,
उसके बहानो का सिरहाने खिंच,
उसकी आलस की रजाई को हटाया होगा।

उसकी हर बात को काट कर,
उसके हर तर्क को तोड़ कर,
स्कूल जाने के लिए उसे बिस्तर से,
जबर्दस्ती बाहर खींच कर निकाला होगा।

कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

बेटे के लटके हुए मुंह को देखकर,
मन उसका भी उदास हुआ होगा,
तभी तो स्कूल जाते हुए अपने बच्चे के
बालों को उसने सहलाया था।

अजीब लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

घर से निकलते हुए बेटे को देख,
उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना न था,
आखिर बेटे ने माँ की बात मानी,
इससे बड़ा भला क्या कोई इनाम था?

गर्व होता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

बेटे ने जब अलविदा कह कर,
उसकी ओर अपना हाथ हिलाया होगा,
तब माँ ने भी उसे घर आकर,
"क्या खाओगे" का लाड़ दिखाया होगा।

अच्छा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

आखों से ओझिल होने तक,
रूककर भी उसने उसे देखा न होगा,
आखिर देखती भी क्यों?
उसका बेटा तो सिर्फ स्कूल जा रहा था सरहद नही।

अच्छा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

बिखरे घर को समेटती माँ को,
पता नही था की उसका घर बिखर गया,
तभी तो वो अब भी यही सोच रही,
उसका बेटा घर आकर क्या खायेगा ?

कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

जब उसे पता चला होगा,
अपने को कोसते हुए, अपनी छाती को पीटा होगा ,
माथा पकड़ यही सोचा होगा,
क्यों उसने अपने बेटे की बात नही मानी ?

अब कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।

स्कूल की वर्दी में मुस्कुराते हुए,
हाथ हिलाते हुए उसका बेटा ,
जब कफ़न में आया होगा,
बिलखते कांपते हाथों में उसने उसे सीने से लगाया होगा।

कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।
कैसा लगता होगा उस माँ को,
जिसने अपने बेटे हो सुबह जगाया होगा।


Friday, September 26, 2014

बेलगाम "हां"

जब भी इसकी किसी पर पड़ती है मार,
सच्चाई, तुलना और ज्ञान हो जाते है तार-तार,
इसके आगे सब जाते है हार,
खाली इसका जाता नहीं है कोई भी वार।

अपनी होकर भी यह नहीं बनती है ढाल,
इसकी जान सका न कोई चाल ,
बन कर फिर मेरा यह काल,
देखो, फिर कर गयी है मुझे बेहाल।

बेहयाई से दिखाते हुए यह दांत ,
खिंच कर ले जाती है मेरी साँस,
दुहाई में निकले मेरे शब्द "हाय-हाय",
इक पल में इसे यह "हां" में बदल जाएँ। 

कहते है दिलो-दिमाग की सुनो बात,
मिलकर करो कुछ ऐसा हिसाब,
ताकि समस्याएं हो जाएँ आसान,
परिस्थिति भी हो जाएँ हम पर मेहरबान।

पर दिमाग की यह सुनती नहीं है कोई बात,
चाहे बिगड़ जाएँ फिर कितने ही हालत,
सूख जाएँ कंठ या पेट की आंत,
करेगी वहीँ जिसमे साथी दे इसका साथ।

मुंह से निकले शब्द और साथी गर्दन का झुकाव,
अपनी प्राथमिकताओं को लगा कर दांव,
दूसरों की मदद करने का निस्वार्थ भाव,
जल्द ही बदल देता है चेहरे के हाव-भाव। 

ऐसा ही होता है जब बिन सोंचे कहते है हां,
"न" शब्द मन के कोने में पड़े रह जाते है बेजान,
हो जाती है सब प्लानिंग तब बेकार,
एक बार जो मुख से फिसले जुबान।

इसलिए गांठ बाढ़ लो मेरी एक बात,
चाहे रुआंसे चेहरे लिए सामने खड़े हो जाएँ हालत ,
तुम अड़िग और दृढ़ता का ले साथ ,
चलाओगे जुबान जब तुम्हारे काम से हो खाली हाथ।

 

Wednesday, July 16, 2014

अभिराज और हम

तीन साल कब गए हैं बीत ,
कुछ पता ही न चला,
समय बढ़ने की ये रीत ,
रोके से रुका है क्या भला ?
 
तुमसे गई हूँ मैं इतनी जुड़,
कि देखती हूँ जब पीछे मुड़ ,
हो जाती हूँ मैं हैरान ,
कैसे बदल गया भावनाओं का सामान। 
 
कुछ समझाने से डरते कदम,
आज, मेरे तुम्हें है समझाते ,
डांट कर डराती मेरी आँखें ,
तेरी मुस्कान पर है मर जाते।
 
तेरे आधे अधूरे शब्द भी ,
मेरे आगे एक कहानी है कह जाते ,
तेरी बदमाशियों के आगे,
मेरे क्रोध के कदम क्यों है डगमगाते। 
 
"तेरे-मेरे" शब्द पर चिढ़ते भाव ,
"मेरी मम्मा " सुन आज गदगदाते,
बिखरी चीजों को देख,
आज मेरे शब्द क्यों नहीं चिल्लाते!
 
तेरी हर इच्छा हो पूरी,
चाहे रह जाएँ नींद मेरी अधूरी ,
थके हुए क़दमों को थामे ,
ऐसी क्यों है इच्छा जागे !
 
दुआं है मेरी उससे ,
हर साल जन्मदिन पर जुड़ें किस्से ,
खुशियों का यह दौर चलता जाएँ ,
समय चाहें कितना ही आगे निकल जाएँ।  
 
किसी से तुम घबराना नहीं,
गिरने के डर से कपकपाना नहीं ,
मुड़कर देखों तो एक बार पीछे ,
एक की जगह दो सायें खडें है तेरे क़दमों के नीचे। 
 
- प्रीति बिष्ट सिंह